फ़र्ज़ का क़र्ज़
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अहसान बट्ट अपनी दीवार पर टँगी वर्दी और उसकी छाती पर टंगे तमग़ों को ऐसे निहार रहे थे जैसे कोई पिता अपने बच्चे की किसी उपलब्धि पर उसे प्रेम और गर्व से भरी शाबाशी दे रहा हो । लेकिन कुछ क्षण के लिए उनके चेहरे पर कुछ उदासी के भाव आए। जैसे में कुछ उधेड़ बुन चल रही हो।
भारतीय सेना में पूरे २५ साल दिए थे उन्होंने । जम्मू कश्मीर लाइट इन्फ़ंट्री में उनका कार्यकाल किसी शूरवीर जैसा गुज़रा था। पूरी सेना उनका सम्मान करती थी। सेवा निर्वित हो जाने के बाद भी सेना के अफ़सरों और उनके चाहने वाले सिपाहियों का आना जाना उनके पास लगा ही रहता था। वे सेना में लेफ़्टिनेंट कर्नल की पोस्ट पर रहते हुए रिटायर्ड हुए थे। कई सारे बहादुरी पुरस्कार जीते थे उन्होंने। कारगिल युद्ध में दुश्मनों के हाथ से टाइगर हिल वापस हाँसिल करने में उनकी टुकड़ी (तब वे मेजर हुआ करते थे ) का महत्वपूर्ण योगदान था। उनकी उसी बहादुरी के लिए उन्हें वीर चक्र के सम्मानित किया गया था। अपने कार्यकाल में उन्होंने कुल ग्यारह आतंकवादी मारे थे। एक बार तो दो दो आतंकवादियों से अकेले भिड़ गए थे जो उनकी छावनी पर आक्रमण करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने अकेले दोनों को मार गिराया था लेकिन उस दौरान उनकी टाँग में गोली लगी थी। ज़ख़्म तो अब नहीं रहा लेकिन थोड़ा लँगड़ा कर वे अब भी चलते हैं। इस घटना के बाद ही उन्होंने निर्वृत्ति ले ली थी । उन्हें वीर चक्र के अलावा , सेना पदक, विशिष्ट सेवा पदक और राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त हो चुके थे। और उन्हें आपके कार्यों पर बहुत नाज़ था। आख़िर देश की उनके जैसी सेवा भला कितने लोग कर पाते हैं।
तभी अंदर से फ़ातिमा ने आवाज़ दी। खाना खा लीजिए ये तमग़े पेट नहीं भरेंगे आपका। वे थोड़ा मुस्कुराते और बोले सही कहा बेगम ये पेट तो नहीं भर सकते लेकिन तृप्ति से भर देते हैं। लेकिन कभी कभी ये सोच कर निराशा होती है की तुम्हे एक बढ़िया ज़िंदगी ना दे सका। हमारे देश में नेता बिना कुछ किए जितनी आलीशान ज़िंदगी जीते है सिपाही अपना सब कुछ न्योछावर कर भी उसका अंश मात्र नहीं जी सकता। नदीम नहीं आया बहुत दिनों से अब की बार। नदीम उन दोनों का बेटा था जो जम्मू में इंजीनिरिंग पढ़ रहा था। फ़ोन आया था उसका परसों किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में पठानकोट गया है दो चार दिन में आ जाएगा। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
क्रमश: ——दीपक जैन——