ओम नमः शिवाय
आर के लाल
पर्वती जी ने कहा- " प्रभु, आपका यह भक्त आपके दर्शन के लिए प्रतिदिन सुबह 4:00 बजे से ही लाइन में लग जाता है। नंगे पैर घर से चल कर आता जाता है। पूरे सावन भर आपके ऊपर जल चढ़ाता है रोज पचास रुपए का फूल और दूध चढ़ाता है और व्रत रहता है। देर तक पाठ करता है। इसकी तरफ तो आप देख ही नहीं रहे हैं। दूसरी तरफ वह व्यक्ति लाइन में भी नहीं लगा, कोई फूल या भांग धतूरा भी आपके ऊपर नहीं चढाया और मंदिर के बाहर से ही हाथ जोड़ कर चला गया। मैंने देखा कि दूसरे वाले को जब ठोकर लगी तो आपने कार के नीचे आने से उसे बचा लिया। इसका मतलब दूसरे वाले पर आप ही कृपा ज्यादा है। ऐसा क्यों है?"
भगवान ने कहा - "यह तो सही है परंतु पहले वाले में बहुत अहम है। उसके मन में रहता है कि वह इतना कर रहा है, इतने का फूल माला चढा रहा है। उसका पूजा में मन नहीं लगता। उसका ध्यान बाहर रखे उसके कीमती सामान और जूता पर ही रहता है। श्लोक भी जल्दी-जल्दी पढ़ता है और बीच में सोचता रहता है कि देर हो रही है। इस प्रकार उसकी पूजा व्यर्थ है। उसे कुछ मिलने वाला नहीं है।"
भगवान ने फिर कहा कि सिद्धि, पूजा दीर्घ अवधि अथवा चढ़ावे की मात्रा का नहीं होता बल्कि भावना और समर्पण का परिणाम होता है। दूसरे व्यक्ति ने एक क्षण में ही अपनी पूरी आस्था के साथ श्रद्धा सुमन अर्पित कर दिए इसलिए वह पहले वाले से बेहतर है।