उसके हिस्से का अमृत
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वो सबला थी अबला घोषित हुई
समर्थ थी आश्रित बना दी गई
जब खुद को साबित करने चली
नजाकत उसे छोड़ कर चली गई।
खड़ी दोराहे पर सोच में डूबी हुई
खता उससे कब और कहाँ हो गई
चाहा कंधे से कंधा मिलाकर चलना
मगर चार कदम वह आगे बढ़ गई।
अनजाने में कुछ अनचाही सी कर गई
मर्द की मर्दानगी को आहत कर गई
और करीब आने की ज़िद थी उसकी
दिल से ना जाने वो कब उतार दी गई।
घर, बच्चे, रिश्ते नाते संभालती रही
मर्द को हर दर्द से मुक्त करती रही
थोड़ा सा खुद के लिए जो जीने लगी
अपनो की आंखों की किरकिरी बन गईं।
मुड़कर नही देखेगी अब एक पल को भी
प्रगति के पथ पर सभी को पछाड़ने लग गई
जवाब देगी सटीक हर बात का तुरंत ही
कर्तव्यों सँग अधिकार भी समझने लग गई।
अब लद चुके वह दिन जब सभी कहते थे
पुत्र जायदाद और बेटियां इज्जत संभालती हैं
सँग ही इज्जत के अब वह जम कर
पिता की जायदाद को संभालने लग गई।
मार खाती है एक ही बात से हर बार
ईश्वर ने उसे ग्राह्ता बनाकर भेज दिया
झूठे दम्भ को संतुष्टि का पोषण देने
पुरुष उसके बलात्कार पर उतर चला।
जननी थी वह जनानी बनकर रहती थी
मर्दानी का रूप वह धरने लग गई
शारीरिक कमजोरी को भी हर पल
तर्ज पर लौहपुरुष की संवारने लग गयी।
हर घड़ी हलाहल पीती चली गई
अवधूत की कृपा फिर भी न पा सकी
अब फेंक दिया उसने हलाहल का पात्र
अपने हिस्से की सुधा अर्जित करने लगी
संघर्ष यहाँ खत्म नही होता उसका एक पल
घर सँग बाहरी दुनिया में तालमेल बैठा गई
महज अपना काल्पनिक घरौंदा बचाने को
झूठे मर्दाने अहम को पोषित करती चली गई।
बढे कदम अब उसके रुकने का नाम न लेंगे
बदलाव की बयार को सुनामी करती चली गई
समझना होगा अब मर्द को हर पल हर घड़ी
समानता का दर्जा सम्मान सँग पाकर ही रुकेगी।
वह नारीवाद का सहारा छोड़ चल दी
अपनी धुन में जुटी रहती हर पल हर घड़ी
नही जरूरत अब उसे सहारे की सुन लो
मजबूती से सहारा कमजोरों को देगी
विनय...दिल से बस यूँ ही