मैं खड़ा रहा तुम्हारे इंतजार में,
मगर तूम नही आए...
किस कम के वो आँसू
जो मेरी जुदाई मे बहाए
मैं कुछ ओर देर खड़ा रहा तुम्हारे इंतजार में
मगर तुम नही आए...
शरद ऋतु की ठंडी हवाओ में
गरजते हुए बदलो की काली घटाओ में
फगुम्न मास की मस्ती मे
दिवानों की बस्ती मे
ज़िंदगी के हर सफर में
मैं कुछ इस तरह करता रहा
तुम्हारा इंतजार
जैसे निसाद मे लॉट आएगी बयार
मैं खड़ा रहा तुम्हारे इंतजार में....
मैं अपनी फटी पुरानी उन यादों में
तुम्हारी रंगिनियत भरी आंखो से
करता रहा दीदार
जैसे उजाड़ वन मे लॉट आएगी बय्यार
याद करता रहा तुम्हारी वो बचकानी सी हरकतो को
मेरे गले मे बनकर हार लिपटे हुए
तेरे कोमल हाथो को
ज़िंदगी के सफर के हमसफर की बातों को
सूरज की अंतिम किरण तक
मैं कुछ इस तरह याद करता रहा
तुम्हारा इंतजार
जैसे चाँद ने किया हो चकोर से
प्यार का इजहार
मैं खड़ा रहा तुम्हारे इंतजार में...
श्रावण की बरसते बारिश की बुंदों में
बागों मे खिले फूलो की नवीन कलियों मे
कुछ इस तरह करता रहा तुम्हारा इंतजार
जैसे नाविक ने किया तूफानो से लदकर दरियाँ पार
मैं खड़ा रहा तुमहारे इंतजार मे...
यूह तो ज़िंदगी के सफर मे
बहुत मिल जाते हे हमसफर
मगर तुम्हारे बिना फीका लगता हे
दुनिया का रंग भरा सफर
इसलिए मैं खड़ा रहा तुम्हारे इंतजार मे
मगर तुम नही आये...
कवि एन आर ओमप्रकाश "हमदम"।