“मेरी समझ”
आर0 के0 लाल
मैं अक्सर अपने बचपन में गर्मियों की छुट्टी में गांव में सुबह 4:00 बजे जगकर आम बिनने बाग पहुंच जाता था। मेरे पेड़ के पास ही पड़ोसी का भी पेड़ था। मैं पहले उसके नीचे पहुंच कर वहां गिरे आमों को उठा लेता था और फिर लौट कर अपने पेड़ के नीचे से आम उठाता। मुझे लगता था कि मेरे पेड़ से कम आम गिर रहे हैं जबकि पेड़ में बहुत सारे आम लदे हैं।
एक दिन पड़ोसी के पेड़ के नीचे न जाकर अपने पेड़ के नीचे बैठ गया। कुछ देर में मुझे बहुत ढेर सारे आम मिले। मुझे लोगों ने बताया जिस समय मैं उसके पेड़ के नीचे आम लेने जाता हूं उतने में दूसरे लोग आकर मेरे आम उठा ले जाते हैं।
लोग कहते कि जब अपने पास इतना ज्यादा है तो फिर क्यों दूसरे की चीजों पर अपनी नजर रहती है? उस समय तो यह बात मेरे समझ में आ गई थी मगर जीवन भर इससे मुझे छुटकारा नहीं मिला। हमेशा दूसरों की वस्तुओं को देख कर लालायित होता रहा। उसे पाने की अभिलाषा व्यक्त करता रहा और मुझे जो भी भगवान ने दिया वह भी गंवाता रहा।
आखिर क्यों का कोई उत्तर नहीं है, इसलिए भगवान को धन्यवाद देते हुए उनका उपयोग करना चाहिए था।