Hindi Quote in Poem by Rishi Sachdeva

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शब्द को निःशब्द कर दूं, वाणी को विराम दूँ,,
ह्रदय में है आज कुछ ऐसा करूँ की स्वयं को अभिमान दूँ ।।
संवेदनाएं है मृतप्रायः आज उन्हें जाग्रत करूँ,,
हूं मैं मानसपुत्र ये स्वयं को ही सिद्ध करूँ।।

कोलाहल बहुत है जग में, शोर में मैं खो गया,,
जग जाऊं गहरी निद्रा से जीवन को सार्थक करूँ।।
निष्कंटक नहीं है राह मेरी, पर जग में हर कोई ऐसा, मैं अकेला तो नहीं,,
जीया पर क्यो निरर्थक जीया ? आज क्यों न पश्चताप करूँ ?

चल मुस्करा स्वयं से बात कर ये तय किया, आज की सुबह इक नई सुबह हुई,,
जगा, उठा ओर चला इक नई शुरुआत हुई ।।
आज सुनाई दे रही चिड़ियों की चहचहाट मुझे,,
आज दिखाई दे रही बरसो बाद अम्बर की तरुणाई मुझे ।।

चल अकेला राह पर पथिक, भीड़ पीछे आएगी,,
बून्द पड़ेगी जब अकेली, बारिश को पीछे लाएगी ।।
आज इन नन्ही बूंदों ने धरा की प्यास बुझाई है,,
सत्य यही है छोटी छोटी नदियों ने सुमद्र को पहचान दिलाई है ।।

"अभिव्यक्ति" ऋषि सचदेवा, हरिद्वार । 9837241310

Hindi Poem by Rishi Sachdeva : 111217200
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