जब उठें प्रेम की सरगोशियाँ फिजाओं में
मौन मुखरित हुई खामोशियाँ हवाओं में
पीत पट मोर मुकुट अधर जब धरे बंशी
मार का ज्वार उठे जिन्दगी शिराओं में
जंग ऐलान में महफिल नहीं सजा करती
रूप की धूप वीर को नहीं छला करती
हाथ में चक्र हो बहती हो ज्ञान की गंगा
शंख बजता है बाँसुरी नहीं बजा करती
आग सावन की हो बहार लिखो गीतों में
देश की आन हो संहार लिखो गीतों में
कुबेर मिश्र