सरस्वती वंदन
हंस पे सवार वाद्य रव मधुर सितार,
शुभ्र वस्त्र का निखार, देवि ज्ञान बुद्धि दायिनी।
छंद रस की धार सृष्टि चर-अचर प्रसार,
शम्भु दृष्टि मार क्षार, व्योम नाद अंक शायिनी।।
तुम जगत विलास जीव जिन्दगी का हास,
कृष्ण गोपिका का रास, सिन्धु शान्ति में विराजती।
बुद्धि की हो आस तीन लोक का प्रकाश,
चिर प्रकृति की श्वास-श्वास, बुधि विवेक ध्यान साजती।।
कुबेर मिश्र