अब मैं...
तजुर्बे के मुताबिक़, खुद को ढाल लेता हूं;
कोई प्यार जताए तो, जेब संभाल लेता हूं!
नहीं करता थप्पड़ के बाद, दूसरा गाल आगे;
खंजर खींचे कोई, तो तलवार निकाल लेता हूं!
वक़्त था सांप की, परछाई डरा देती थी;
अब एक आध मै, आस्तीन में पाल लेता हूं!
मुझे फासने की, कहीं साजिश तो नहीं;
हर मुस्कान ठीक से, जांच पड़ताल लेता हूं!
बहुत जला चुका उंगलियां, मैं पराई आग में;
अब कोई झगड़े में बुलाए, तो मै टाल देता हूं!
सहेज के रखा था दिल, जब शीशे का था;
पत्थर का हो चुका अब, मजे से उछाल लेता हूं!