कबीर दास जी ,मसि कागद छुयो नहीं ।कलम गह्यौ नहिं हाथ ।परन्तु निर्गुण भक्ति धारा का काव्य संसार बिना इनके पूर्ण ही नहीं हो सकता ।
साधो तेरो न कोई बैरी न मीत ।राम बनाया सगरो जग है। कोउ नाहिं मेरो राम से अलग है। राम को कैसे दुःख में डारौं ।करि घिरना अरु प्रीत । साधो तेरो न कोई बैरी न मीत ।