????आज़ के आधुनिक विकास के युग मे लगातार बने हुए ज्वलंत मुद्दे पर कुछ पंक्तियाँ लिखने की कोशिश की है। ?????????
जाओ ट्विंकल सो जाओ तुम,
स्वर्ग-परियों की गोदी में,,
ये जहाँ नहीं इस काबिल,
जो रही यहाँ मन-मौज़ी से।
कैसे इंसाँ रहे वो होंगे,
पशुओं से भी क्रूर बने,,
बन भेड़िये हिंसक हुए,
इंसानियत पे नासूर बने।
मन-तन सिहर जाता है सुन,
तुम पर जो अत्याचार हुए,,
हाथ ना काँपे दुष्टों के,
शर्म-दया-धर्म सब भूल गये।
कैंडल मार्च, अवार्ड वापसी,
न्याय ज़रूर माँगेंगे हम,,
अभी थोड़े व्यस्त हैं पहले,
हिन्दू-मुस्लिम करले हम।
जाने कितनी ट्विंकल अब तक,
मानसिक विकृति की भेंट चढ़ी,,
न्यायपालिका की बलिवेदि पर,
चुनौतियां कितनी बड़ी खड़ी।
तमाशा यहाँ पर बना हुआ है,
नन्हीं गुड़ियों की चोटों का,,
सुग्बुगहाट सी होती है जैसे,
मसला हो नोटों-वोटों का।
संविधान के रखवालों सुन लो,
जन-जन की है यहि पुकार,,
फाँसी सीधे दे दो उनको,
निकृष्ट कर्म के जो कर्णधार।।
"राजीव कुमार गुर्जर"