आग बबूला सुरज होये|
आओ मेघा धरती रोये||
गर्मी सबकी नींद उड़ाती
चारो तरफ उदासी छाती
पंक्षी भी सारे अकुलाते
वृक्षों के पत्ते मुरझाते
सहा नही जाता ये सूखा
तपे जेठ अब आपा खोये||
आओ मेघा धरती रोये||
पानी का स्तर है घटता
ताप धरा पर बढ़ता जाता
देख रहे सब राह तुम्हारी
तू अम्बर से नही उतरता
धूप ताप से व्याकुल प्राणी
आ जा तू कित जाकर सोये|
आअो मेघा धरती रोये||
डॉ.शिवानी सिंह