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डॉ. शिवानी सिंह मुस्कान

डॉ. शिवानी सिंह मुस्कान

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आग बबूला सुरज होये|
आओ मेघा धरती रोये||

गर्मी सबकी नींद उड़ाती
चारो तरफ उदासी छाती
पंक्षी भी सारे अकुलाते
वृक्षों के पत्ते मुरझाते

सहा नही जाता ये सूखा
तपे जेठ अब आपा खोये||

आओ मेघा धरती रोये||

पानी का स्तर है घटता
ताप धरा पर बढ़ता जाता
देख रहे सब राह तुम्हारी
तू अम्बर से नही उतरता

धूप ताप से व्याकुल प्राणी
आ जा तू कित जाकर सोये|

आअो मेघा धरती रोये||

डॉ.शिवानी सिंह

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