मौसम-ए-मिजाज शायराना मिलता है,
शमा के साथ हर वक़्त परवाना मिलता है।
कुछ ऐसे होती है खुशनुमा सुबह अपनी,
आंसूओं से भीगा अपना सिरहाना मिलता है।
शायद रात को सपने में फिर देखूँ तुझे,
यूँ एक दिन जीने का बहाना मिलता है।
ओढ़ के सो जाता हूँ यादों की चादर खुद पे,
कहाँ उस रजाई में आशियाना मिलता है।
आदत हो गई तेरी तस्वीर से बात करने की,
जवाब में खामोशी का नज़राना मिलता है।
तू कभी मुझे ख्वाबो में भी मिलने आती नही,
तेरी यादों का "पागल" को अफसाना मिलता है।
✍?"पागल"✍?