मेरे बाग का वो परिन्दा,कुछ अनमना सा बैठा है
किसी और शजर पर जानें आशियाना बना बैठा है
अब ना वो रंगत है ना वो बेबाक है पहले की तरह
जाने क्या बात है जिसे वो दिल से लगा बैठा है
हमने चाहा की पूछ लें आखिर के माजरा है क्या
फेर कर नज़रें अपनी,वो चुप सी लगा बैठा है
जब से रूठा है,सारा आलम खफा खफा सा है
जाड़े की नर्म धूप को,वो असाढ़ बना बैठा है
हम है मजबूर के कैद कर सकते नहीं है उसको
वो भी तो नादाँ है जो अपना दिल गवाँ बैठा है।
aaliya