लोगों की आदत
लोगों की तो आदत बुरी है
मुॅंहमें राम बगल में छुरी है
व्दार ईश्वर ये दान चढाये
राह भिखारी नजर न आये
हरवक्त हाथ फैलाये
निराश हो तब बोल लगाये
धन के मालिक खुब बरसाये
निर्धन को ये तुच्छ कहलाये
करे सैर जब चारो धाम
बुढे माॅं-बाप का करे अवमान
काला गोरा भेद ये करते
भला सावले को क्युं स्मरते (सावला-क्रीष्न )
राह चलाये मंहगी गाडी
राहगीर को कहे अनाडी
सरकारी टैक्स ये न चुकाये
घुस देकर देश डुबाये
सुख की नींद कैसे मिलती
दवादारु पर जिंदगी चलती
मन में भय नित्य सताये
धन की चिंता नींद उडाये
भला जीवन तुम भी जानो
आधी रोटी सुख की मानो
माॅं-बाप ही ईश्वर अपने
धन की लालसा बुरे सपने
व्यर्थ की चिंता त्यागो मित्रो
साथी तुम दुः ख को मित्रो
ये जीवन को जीना सिखाये
सुर्यांश का जीवन बनाये
@सूर्यांश (suryakant majalkar)