भोला पंछी देख मन में
प्यारी सी एक इछा जागी
क्यूँ ना योगी बन जाऊँ मैं
इस भोले से मन मंदिर का
पर जब अपने मन को समझा
तब आया रूपक चितवन में
ये मन तो है एक पागल पंछी
जो समझे है कोयले को भी सोना
जब समझा उनकी हर बातों को
तब समझा, ये तो है सौ चूहों की गईया
पर फरक ना पड़ता इस पागल मन को
क्योंकी ये तो समझे चमकत को सोना|
जब रूप देख छी कह जावे पंछी
एक चंचल मन बन जावे पंछी
तब आवे एक बात समझ में
रूप तो है बस यूँ ही एक सूचक
जोड़ कर देखा जब सब लम्हों को
तब उभर आया उनका सब रूपक||