#काव्यत्सब
कविता
लझी पड़ीं है जिन्दगी किताबो में इस तरह।
दिमक लगी हो वर्षो से लडकी में जिस तरह ।।
खोखली बातो मे उलझी हुयी है ये दुनिया ।
हैं डिगरियां हाथों में पर शर्मसार है दुनिया ।।
फुटपाथ पर कुछ बच्चे रोते बिलखते सोते है ।
रेप पीडित बच्चो के पिता कोने में बैठे रोते है ।।
जब है सब पडे़ लिखे तो क्यूँ एसे हादसे होते है ।
पूछो उन समाजो से जो हाथों में मोमबत्तियाँ लिये घुमे है।।
कहा होते है उस समय जब इस तरह के हादसे होते है।
मर जाती है इन्सानियत या घरो में छिपे रहते है ।।
क्या पडे़ लिखे समाजो मे एसे ही लोग होते हैं ।
जो दिन में सरीफ रात खाली सड़कों पे हेबान बने होते है।।
कैसे सुरक्षित हो बेटिया जब चाह लिये घूमे बेटो की।
कैसे मिलेगी बीबी बैठे जब गर्भ में हो रही हत्या बेटी की।
क्या होगी कभी तरक्की एसे हमारे भारत की।
जहा एक औरत ही दूजी औरत को झेले हैं ।।
बेरोज़गार है युवा इन्टरनेट पर समय बिताता है ।
बिडी बियर ताम्बान्कू पर हजरो रूपये उडाता हैं ।।
जब काम न हो हाथों में तब युवा एसे ही बैठ तमासे देखेगा।
जिम्मेदारी ना उठा पाने पर मातपिता को बृध्दाश्रम ही तो भेजेग।
एक दुजे को दोस देता यहा हर कोई अपनी ग्रेबान कहा झाकेगा ।
सोच समझकर बोल रे मनबा तेरी गलतिया पकड़ने हर कोई तुझे ही ताकेगा ।।
मैं ठेहरी एक लेखक बात मन की लेखनी में लिख गयी।
भला बुरा जो भी समझो सब को इक दर्पण दे गयी।।
✍ RJ Krishna koli ✍