#काव्यात्सब
रचना - लकड़हारा
भोर होने से पहले ही
जाग जाये नित रोज
निकला बो हर दिन घर से
चला जाये जंगल की ओर
जागा आज भी रोज की भाती
चला गया जंगल की ओर
बीन बान कर लकड़ी थोड़ी
बैठ गया पीपल की ओर
रूखी सूखी रोटियाँ
प्याज के संग बो खाया था
पीकर पानी बोतल का
थोड़ा सा बो सोया था
बान्ध गठरी साईकल पर
चला फ़िर बो बस्ती की ओर
आस लगाये घूमा गलियाँ
मिल जाये कोई तो छोर
जाने कब बिकेगी गठरी
कब जायेगा बो घर की ओर
घूमत घूमत सान्झ हुयीं पर
मिला ना कोई ग्राहक उस ओर
बुझी हुयी सी आस को लेकर
चल दिया फिर घर की ओर
चूल्हा कैसे जलेगा घर में
सोच रहा था बो एक ओर
गैस चुल्हे ने रोजी रोटि छीनी
कौन खरीदे अब लकड़ी रोज
पकड़ कर सर कोने में बैठा
कोई तो देखे उसकी ओर
✍ RJ Krishna ✍