मैं तुम्हें वहीं मिलूँगी....
जहाँ ढ़लते सूरज की लालिमा
शाम की बाहों में घिरती है
जहाँ ढ़लती शाम मदहोश हो
सूरज का प्याला पीती है
जहाँ आसमान की आँखों में
नारंगी डोरे उतरते हैं,
जब लौट आते हैं गए हुए
अपने-अपने डेरों पर
मैं भी लौट आऊँगी
सुनो समय के उसी छोर पर
मैं तुम्हे मिलूँगी....
काले नीरव अंतरिक्ष में
जब निकलोगे मुझे ढूंढने
अनंत आकाशीय पिंडो
के बीच, जलते-बुझते
तारों के पार
शब्दहीन उस ब्रम्हांड में
जब भी जहाँ भी
ॐ का अंतर्नाद सुन लोगे
सुनो मैं तुम्हे
वहीं मिलूँगी.....
कितनी भी हो
विषम परिस्थिति,
कितनी हो चाहे पीड़ा अंतर में
भँवरे की गुनगुन में जब
सुन पाओगे संगीत तब भी,
पत्तों पर बिखरी धूप
भर पाओगे अपनी हथेली में
बेबात ही जब मुस्कुरा उठोगे
सुनो मुस्कुराहट की
उस रेखा में
मैं तुम्हे मिलूँगी...
लीन हो जाओगे
ध्यान में जिस दिन
रोम-रोम में उठेगी
आनंद की लहरें,
सारे प्रश्न जहाँ राख हो जाएंगे,
अंतर के कलुष मिट जाएँगे,
नया उजास जब प्रेम का
भर जाएगा भीतर
सुनो
उजास की उसी कौंध में
देखना गौर से डूबकर
मैं तुम्हे वहीं मिलूँगी ....
विनीता राहुरिकर