#काव्योत्सव_२
वतन की आन पर मिटते........
वतन की आन पर मिटते, वतन की शान पर लड़ते ।
वतन के उन सिपाही को, सदा हम हैं नमन करते ।।
स्थितियाँ रहें प्रतिकूल, उनको कब रही चिंता ।
सिरों पर वे कफन बाँधे, सदा तैयार हैं रहते ।।
हवा का रुख बदल देते हैं, यदि वे ठान लेते हैं ।
उन्हें तूफाँ का डर कब है, वे मौसम भाँप लेते हैं ।।
समुन्दर की उठी लहरें, कभी विचलित नहीं करतीं ।
वे सागर की तलहटी को, खुशी से नाप देते हैं ।।
समर जब भी बुलाता है, हमेशा दौड़ जाते हैं ।
घरों की मोह ममता को, घरों में छोड़ जाते हैं ।।
उन्हें बस याद रहती है, हमारे देश की माटी ।
जिसे हम मातृभूमि कह, सदा सिर को झुकाते हैं ।।
उठा कर गोद में माँ ने, कभी लोरी सुनाई थी ।
पिता ने कांधे बैठाकर, उसे दुनियाँ दिखाई थी ।।
लड़कपन में सभी के साथ, मिलकर खेल खेले थे ।
बहिन के हाथों से अपनी, कलायी भी सजाई थी ।।
घोड़ी पर सवारी करके, डोली घर में लाया था।
प्रेम के रंग में डूबा, गोद में फूल पाया था।।
खुशी औ दर्द के हर पल, समेटे झोली में उसने।
इसी माटी में खेला औ, पला जीवन बिताया था।।
अपनी माँ का दुलारा है, पिता की आँख का तारा।
सहारा अपने घर का है, बहन की डोली का काँधा।।
बंधा रिश्तों में वह भी है, हमारे बीच जो होते।
चुकाने फर्ज माटी का, बना सीमा का रखवाला ।।
देश का प्रहरी बन करके, खड़ा है आज दिलवाला।
अमन औ शांति के खातिर, लड़े दुश्मन से मतवाला।।
सुरक्षा देश की करने, जगा है रात और दिन में।
तभी सब चैन से रहते, औ गाते हैं मधुशाला ।।
मनोज कुमार शुक्ल "मनोज"