# काव्योत्सव-2
देश वही है
देश के दरवाजे, खिड़कियां भी वही हैं,
आने जाने वाली हवा भी वही है,
पर देश की आवाज बदल गयी है,
किस्से,कहानियां भी बदल गये हैं,
प्यार करने की विधि परिवर्तित हो चुकी है।
सच और झूठ के मिलन से
देश की दीवारें चटखने लगी हैं,
सत्यमेव जयते वाला कलेंडर फट चुका है,
नया कलेंडर लगाने का मन कर रहा है,
पर मन में अनेक विषय चल रहे हैं।
देश में बहुत बातें होती हैं,
वहाँ सजना- संवरना रहता है,
बहुत सी नये काम करने होते हैं,
यहाँ टूटी फूटी बहुत वस्तुएं निकलती हैं,
देश का सच कभी उखड़ता नहीं है,
लेकिन धूल उसकी बार-बार झाड़नी पड़ती है।
*महेश रौतेला