कविता #काव्योत्सव -2
***सास कभी हम न पाए ***
#व्यंग्य
सर उठा कर जी नहीं पाए ।
हम हैं जमाने के सताए ।।
पहले थे कहते ना समझ ,
अभी नहीं तुम्हें पूरी समझ ।
उम्र तुम्हारी है अभी कच्ची ,
बात ना कर सको बिल्कुल सच्ची ।
हम भी मन की बता ना पाए ।
जमाने के हैं हम सताए ।।
जब हम सब लगे समझने ,
तर्क अपने हम लगे थे रखने,
हक नहीं बेटियों को बोलने का ,
घर की बातों को तौलने का ,
लगने लगा हम हैं पराए ।
हम हैं जमाने के सताए।।
दिल के जज्बात दबा लिए,
आंखों के आंसू छिपा लिए ,
सोचा हम सास बनेंगे जब ,
हुकुम - उदूली करेंगे तब।
दिल का उफान किसे दिखाएं ।
हम हैं जमाने के सताए ।।
कुछ करने की नहीं इजाजत ,
हम हैं किसी और की अमानत ,
रह गए मैं और मेरी तन्हाई ,
कर दी बिना पूछे ही विदाई ,
जन्म के बंधन है छुडाए ।
हम हैं जमाने के सताए ।।
नया घर अब अपना ठिकाना ,
उन्हें था अपने दिल में बिठाना ,
,सर्वस्व अर्पण कर दिया हमने ,
चिरागे- रोशन कर दिया हमने ,
दीप - दीवाली के जलाए ।
हम हैं जमाने के सताए ।।
गलत के आगे चाहा बोलना ,
सख्त हिदायत मुँह न खोलना ,
बहू को हक नहीं कहने का ,
आदेश मिला बस सुनने का ,
तड़प के फिर हम कसमसाएं।
हम हैं जमाने के सताए ।।
सास सदा प्रवचन सुनाएं ,
बहू भी हरदम बडबडाएं ।
सर उठा के जी नहीं पाए,
सास कभी हम बन नहि पाए ,
अपनी पीडा़ किसे बताए ।
हम हैं जमाने के सताए,।।
**नमिता "प्रकाश"