#काव्योत्सव2 .0
॥संरक्षणवाद ॥
आतंकवाद ,सामंतवाद , साम्राज्यवाद ,
नस्लवाद , भाई भतीजा वाद ,
कहीं भ्रष्टाचारर , गरीबी महंगाई
इन सब को हमें मिटाना है ..........
एक चीत्कार से .......
घबराए नेताजी के शब्द ,
हलक में ही अटक गए ।
घूम कर देखा तो सहम गए ।
रो रही थी धरती मां !
करुणा से कातर हो --
पुत्र ! मैंने तो तुम सबको जीवन दिया ,
धन-दौलत , अकूत संपदा दी ,
धरती पर ही स्वर्ग उतार दिया ,
पर ,.....तू ना सहेज पाया ,
विकास की इस अंधी दौड़ ने
इसे और भी कुरुप बना दिया ।
न खेत बचे ,न खलिहान बचे ,
ना खनिज संपदा ,न जंगल बच्चे ,
न हिम रहा , न हिमालय ,
न धरा रही ,न गगन रहा ,
फिर भी तू कितना मगन रहा ,
तब्दील हुई नदियां ,नद में ,
छलनी कर के छाती मेरी ,
कंक्रीटो के इस जंगल में ,
बैठा है तू किस मद में ,
धरती से लेकर नभ तक,
हर जर्रा -- जर्रा प्रदूषित है ।
घुट रहा इसमे दम मेरा ,
गंगा भी कितनी कुलषित है । तू स्वयं हुआ है भ्रष्ट ,
तो कैसे भ्रष्टाचार मिटाएगा ? बोकर बीज बबूल के,
फल कैसे तू खाएगा ?
हे! नारकीय , हे ! नराधम ,
मेरी अस्मिता को तूने तार-तार किया ।
लहराती सतरंगी चूनर को
बेजार किया ।
हे ! सठ ,मूर्ख इन आपदाओं को ,
तूने ही आमंत्रण दिया
फिर क्यों इतना चिल्लाता है ?
गर भूल गया धरती मां को ,
तो खुद को कैसे बचाएगा ?
अब भी वक्त है प्यारे !
स्वयं अलख जगा दे ,
सारे वाद के साथ
पर्यावरण 'संरक्षण वाद ' लगा दे ।
धरा का अस्तित्व बचा ले ।।