# Moral story
4. दिशा ज्ञान
एक व्यक्ति ने पवित्र नदी में स्नान किया और भीगे वस्त्रों में सभी दिशाओं में घूम कर नमस्कार करने लगा। पास से गुजरते एक साधु ने यह देखा तो पूछा,
”तुम यह क्या कर रहे हो ?”
”मैं दिशाओं की पूजा कर रहा हूँ।” ”क्या मतलब? ” "यह तो मैं नहीं जानता।” व्यक्ति ने कुछ झेंपते हुए कहा क्योंकि उसे साधु कोई ज्ञानी पुरुष लगे।
”बिना अर्थ जाने पूजा करने से क्या लाभ।” ”कृपया आप मुझे दिशाओं की पूजा का अर्थ बता कर कृतार्थ करें।” व्यक्ति ने कहा।
“पूजा करने की दिशाएं भिन्न-भिन्न हैं। मातापिता की पूजा अर्थात पूर्व दिशा की पूजा, जिसमें हम उनकी उचित देख भाल करते हैं। आचार्य हेतु दक्षिण दिशा जिसकी पूजा स्वरूप हम उन्हें उचित दक्षिणा देकर उनका सम्मान करें। परिवार पश्चिम दिशा है, जिसकी पूजा में हम उनका हर प्रकार का व्यय वहन कर दायित्व निभाएं। उत्तर दिशा में मित्र व सेवक हैं, जिनसे हम उचित व्यवहार करें। इस के निमित्त हम सेवकों की पूजा करें।”
"सेवकों की पूजा ?" व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा। "पूजा का अर्थ सर झुकाना ही नहीं, सेवकों के प्रति वात्सल्य पूर्ण व्यवहार ही उनकी पूजा है।
-सविता इन्द्र गुप्ता, गुरुग्राम, हरियाणा।