धूप निकली हैं,
आज फिर से,
व्यंग्य बाणों के अखाड़ों में,
हास-परिहास चोटिल हुआ,
घनघोर तिमिर के बाड़ों में,
शब्दों के आड़े तिरछे,
भालों और तलवारों से,
हो गए संस्कार शिथिल,
अशलील अबोध कतारों में,
भावों के फूल हुए धूमिल,
भंगिमाओं के भस्म तिरपालों में,
धूप निकली हैं,
आज फिर से व्यंग्य बाणों के अखाड़ों में.......