#Moral Stories
पाखी
पाखी और उसका पति दोनों ही आनंद का जीवन व्यतीत कर रहे थे। मिट्टी के बरतन बनाना व उसमें रंग भरना उनका पेशा था। उनका एक छोटा बेटा जो जीने का सहारा था। दरअसल बिटिया अपने ससुराल में थी, 9वर्ष का बेटा बिटिया से सात वर्ष छोटा था। जितना ही था, उतने में ही गुज़र बसर कर मज़े में रहते थे। वक्त ने करवट बदली, पति की अक्स्मात मृत्यु के पश्चात्, बेटा कुछ अस्वस्थ रहने लगा और लाइलाज बिमारी के कारण बेटे की भी मृत्यु हो गई।
एक शाम पाखी के जीवन का अंधकार बढ़ता ही गया और वह नदी की ओर जीवन समाप्त करने के उद्देश्य से जा रही थी। जंगल झाड के रास्ते तेजी से आगे बढ़ रही थी क़ि तभी रोने की आवाज़ सुनाई दी, उसके कदम जैसे थम से गए। वह अपनी आॅंखों के आॅंसू पोंछ, नज़रें दौड़ाने लगी कि आवाज़ किधर से आ रही है? फिर उसकी नज़र दो नन्हें नन्हें बच्चों पर पड़ी, दोनों ही खरगोश के बच्चे गड्ढे में गिरे हुए व घायल थे। उसके अंदर की ममता फिर से जगने लगी। दया प्रवृति के कारण उन बच्चों को बाहर निकाला, उन्हें नदी के पास लाकर पानी पिलाया। दोनों बच्चे अपनी नन्हीें व मासूम आखों से पाखी की ओर देखने लगे। पाखी ने भी अपने दिल की आवाज सुनी और उन दोनों को अपने घर ले आई। मरहम पट्टी व देखरेख में अपना समय व्यतीत करने लगी, उसने दोनों का नामकरण भी किया। इस तरह वह अनाथ पशु-पक्षियों को अपनी शरण में रख उनका सहारा बनी, जीवन को एक और अवसर दी।
.............. अर्चना सिंह जया