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वैतरणी पार:
मुझे उनके पीपप पानी में जाना है। कुमाऊं में मृत्यु के बारवे दिन पीपल पानी की प्रथा संपन्न की जाती है।लोग श्रद्धा से पीपल में, पानी में कुछ बूंदें दूध की मिलाकर चढ़ाते हैं।
पीपल को कलियुग का कल्पवृक्ष माना जाता है जिसमें देवताओं के साथ-साथ पितरों का भी वास है, ऐसा कहा जाता है।
पीपल में पानी डालने से पहले पंडित जी क्रिया कर्म घर में और घर पर आवश्यक पूजा- पाठ करते हैं। जजमान जब दक्षिणा देते हैं तो पंडित को दक्षिणा कम लगती है तो वह कहता है," दक्षिणा कम है, इतनी दक्षिणा में दिवंगत की आत्मा वैतरणी पार नहीं कर पायेगी।" पंडित वैतरणी का डर दिखाकर जजमान की आस्था का दोहन कर रहा है।
परंपरागत लोभ,मोह दिखायी दे रहा है। वैतरणी दिवंगत आत्मा पार होगी या नहीं,यह तो पता नहीं, लेकिन पंडित का लोभ उसे वैतरणी से उलझा कर रख रहा है।पहले मुट्ठी में भरकर दक्षिणा दी जाती थी।अब सामने गिना जाता है और साथ में लोभ की वैतरणी बहती रहती है।धन की जड़ में मित्रता और वैमनस्य दोनों होते हैं। सच कहने का रिवाज कम होते जा रहा है।
आधुनिक क्रियाक्रम पर बातें हो रही हैं। क्रिया-घर में दो गाय के बछड़े हैं, हर मृतक के लिए उन्हीं का प्रयोग होता है। पंडित भी एक जजमान से प्राप्त बिस्तर, चारपायी को कई मृतकों के अन्तिम संस्कार में प्रयोग करते हैं और उनके बदले में नकद रुपये जजमानों से ले लेते हैं।
मैं सोच रहा हूँ, उन्होंने वैतरणी पार की होगी या नहीं?