॥गज़ल॥
चाँद को देखा आइने की तरह ,
चाँदनी देखकर मुस्कराने लगी ।
रात का काजल अपनी आँखों में भर ,
दिल के दरवाजे पर वो नहाने लगी ।।
वक्त की आँधियों मे सभल न सके ,
वहीँ चोट फिर से सहलाने लगी ।
दर्द इतना बढा कह सके भी न हम ,
अब तो दीवारों भी सब बताने लगी ।
मेरी ख्वाहिशें औंर मुकद्दर हो तुम ,
जिन्दगी बन गज़ल गुनगुनाने लगी ।
॥नमिता "प्रकाश "