बदमाश बुढ़ापा
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बूढ़ा – वाह रे ऊपर वाले, तेरी लीला कैसी है? जीवनभर घिस घिस कर मेहनत की, पैसे बचाए, घर-संसार निभाया, रिश्ते-नाते संभाले, गूंगे जानवरों को खाना भी दिया, कोई बड़ा पाप नहीं किया, फिर भी आज तेरी अदालत का मुजरीम बना इधर सज़ा भुगत रहा हूँ,
तेरा यही इंसाफ़ है क्या? इस से अच्छा तो मै नास्तिक होता तो अच्छा होता, तुज पर भरोसा किया तेरी भक्ति की, क्या मुझे अपनी अच्छाइयों का कोई फल नहीं देगा? इतना भी कठोर मत बन की लोग तुजे पूजना ही बंद कर दे? मेरी फरियाद सुन और मेरा न्याय कर...
भगवान – तेरा हो गया... अब में बोलू? मेरी पूजा कर के मुज पर एहसान नहीं किया तूने...सुन ले, हर बार तेरी भक्ति के साथ कोई ना कोई बड़ी मांग अवश्य होती थी. गूंगे जानवरों को खाना खिलाया यह गिनाता है? तो सुन,..
उन्हें तेरी तरह हाथ नहीं दिए हैं, तुजे हाथ दिए हैं, और इसी लिए दिए हैं की तू अपनी मदद कर और दूसरों का भी भला कर.
अब बात करते हैं तेरे पाप कर्मो की... तो गिनता जा,
तूने बुढ़ापे का ढोंग रचा कर निवृत होने का पाप किया, जब तूं खाना-पीना नहीं छोड़ रहा था, भोग-विलास नहीं छोड़ रहा था तो काम क्यूँ छोड़ा? तूने उधर काम छोड़ा मैंने उसी वक्त तेरे शरीर में डायबिटीज़, ब्लडप्रेशर कमज़ोरी थकान यह सब प्लांट कर दिया.
अब बात करते हैं तेरी बचत और कमाई की, तो क्या तूने अपनी कमाई परिवार में कभी बांटी? साप की तरह उस पर कुंडली मार कर बैठा रहा..
इसी लिए तुझे मैंने बेवक्त उठा लिया है, धन संचय ज़रूरी है लेकिन, उसकी संघ्राखोरी तो पाप ही है.
जब जब तू बीमार पड़ा तूने और बढ़ चढ़ कर अत्याचार किये, खाते वक्त गंदगी, कम बीमारी में अधिक दर्द का ढोंग, बच्चो के सामने बच्चा बन कर ज़िद की,
फिर बुढ़ापे में बीमारी के चलते जो जो खाना तुजे वर्जित था वह सब तूं खाता रहा, तूने यह तक परवाह नहीं की के, तेरे इस बर्ताव से परिवार की मुश्किलें और बढेंगी.
तूं जब तक जिया खुद के लिए जिया, और जब तेरी मनमानी ना हुई तो तूने ढोंग किये, जगड़े किये.
कुछ लोग होते हैं जिनके आने के बाद घर वाले उसे जाने नहीं देना चाहते? लेकिन तूं ऐसा जीव है जो परीवार से हमेशा के लिए जा चूका है फिर भी वहां नीचे कोई दिल से दुखी नहीं है...
हे वृद्ध प्राणी, जीवन तुजे पानी की तरह जीना चाहिए था, जिस पात्र में गया उस के मुताबिक ढल गया, लेकिन तूं तो जहाँ गया, जिसके साथ रहा उन्हें त्राहिमाम और त्रस्त करा के आया है. अब अपने कर्मों की सज़ा भुगत, तेरा यही न्याय.
शारांश – वृद्धाअवस्था तकलीफों से भरपूर होती है यह सत्य है, लेकिन कुछ वरिष्ठ-गण इस अवस्था का दुरपयोग भी करते हैं, यह परिवार के लिए कष्ट-दायक हो सकता है. इसी मुद्दे पर यह कटाक्ष लघु वार्ता है – जय हिन्द