#MoralStories ( आशावादि )
गर्मीयो के दिन थे, चारों ओर पानी कीं बहोत किल्लत थी । वहीं पहाड़ी गांव बूंद-बूंद पानी के लियें तरस रहा था । मानो पुरा गांव सूखे के झपेट में आ गया और बंजर जमीन भी दर्द में कराह करके फटने लगीं थी, ऐसी दारुण स्थित का निर्माण हुआ था ।
अब तो आसमाँ भी तेज कहर बरसा रहा था । हवा का रूख आंधियों के संग रुद्र तांडव करने लगा था । ऐसा सुर्यदेव का प्रकोप पहाड़ी गांव पर पड़ा था की पानी का नाम निशान मिट गया, लोग त्राहि-त्राहि माह पुकारने लगे थे । फिर भी लोग जीने की जद्दोजहद में पंद्रह-बीस मींलो की दूरी तय करके थराना गांव में पानी लेने जाते थे । जो अत्यंत कठिन राहों पर चलकर जाना था इसलिए कई लोगो की मृत्यु भी हो गई थीं ।
गांव में एक आशावादि व्यक्ति भिमा रहता था । वो हिंमतवान और मेहनती था इसलिए कहता फिरता था कि
' तुम सब अपने किस्मत पर मत रोया करो बल्कि सूखे तालाब पास एक कुआँ खोदे तो अवश्य पानी की समस्या हल हो सकती है , ये सुनकर गांव के लोंग कहते है " क्या पगला गये जो मुर्ख जैसी बाते करते हो
भिमा- " मैं मुर्ख ही सही लेकिन कोशिश करने में कैसी बेझिझक
लोग- " तुम्हें क्या पता अकाल का प्रभात पड़ा है यहाँ कुआँ खोदकर पानी ढूँढना सब व्यर्थ है ' ।
लेकिन भिमा अकेला पूरी लगन से कुआँ खोदने की शरूआत करता हैं ये देखकर गांव के लोंग हंसकर कहते है ' ये भिमा वाकई में पगला गया है " !
दुसरी तरफ भिमा की कई महिनों की मेहनत आखिरकार रंग लाई और पानी का दुर्लभ दर्शन हुआ, जो गांव वाले भिमा पर कल हंसते थे वो आज सम्मान और मान देने लगे
क्योंकि पुरे गांव की प्यास उस कुएँ से अब बुझने लगीं थीं ।
--- शेखर खराडीं ईडरिया