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जीवनचक्र
मदन सिंह खेत पर मजदूरों से काम करवा रहे थे। पंद्रह साल पहले वह शहर से यहाँ आकर बस गए थे। केवल थोड़ी सी ज़मीन और एक घर ही संपत्ति के नाम पर उनके पास रह गया था। वह भी उनके पिता की दी हुई जायदाद थी।
खुद जो भी कमाया था वह बेटे ने चालाकी से हड़प लिया था। गांव आते समय अपने सोलह साल के पोते को देख कर उन्होंने अपने बेटे से कहा था।
"तुम इसके सामने सही आदर्श नहीं रख रहे हो ?"
मदन सिंह ने जो छिन गया उस पर रोने की जगह थोड़ा बहुत जो हाथ में था उसे बढ़ाने का प्रयास किया। थोड़ी सी जमीन में अपने लायक ठीक ठाक पैदा कर लेते थे। गांव वालों की मदद करते थे। सब उन्हें आदर देते थे।
मदन सिंह मजदूरों को निर्देश दे रहे थे तभी उनके सेवक ने आकर कान में कुछ कहा। मदन सिंह फौरन घर पहुँचे। आंगन में बेटा बहू नज़रें झुकाए खड़े थे। बेटे का व्यापार डूब गया। पोते ने उसे और बहू को घर से निकाल दिया।
मदन सिंह कुछ नहीं बोले। बस यह देख कर चकित थे कि जीवनचक्र कैसे पलट कर आता है।