??सच्चा देश - भक्त??
एक छोटा सा लड़का जो शहर की गन्दगी में से प्लास्टिक इकठ्ठा करता था। वो सिर्फ दस - ग्यारह साल का होगा। वो हर रोज उस विद्यालय के सामने आ कर खड़ा हो जाता था और आते - जाते बच्चों को देखता था।
उस विद्यालय के एक शिक्षक उसे रोज वहा खड़ा देखते थे। एक बार जब 15 अगस्त के दिन जब विद्यालय में कई रंगा - रंग कार्यक्रम हुए। सभी बच्चों ने स्वतंत्रता दिवस बड़ी धूम धाम से मनाया। और विद्यालय में सभी को चॉकलेट और झंडा भी दिया गया। सभी बच्चों ने चॉकलेट बड़े चाव से खाई,पर कुछ बच्चों ने झंडा वही रास्ते में गिरा दिया वो बच्चा वही खड़ा - खड़ा सब देख रहा था। जब सब बच्चे चले गए। तो उस बच्चे ने देखा वहा कई झंडे रास्ते में पड़े हैं उसने बिना कुछ सोचे सारे झंडे उढाए और अच्छे - अच्छे झण्डे एक तरफ रख दिये उसमें से कुछ फटे हुए थे उनको उसने जमीन में एक गड़ा खोद के उस पर रेत से ढक देता है, उस विद्यालय के शिक्षक उसे ऎसा करते देख लेते हैं, वो उसके पास जाकर पूछते हैं,तुम कौन हो और क्या कर रहे हो?
लड़का कहता है,जी मै भोलू, माँ और बाबा के मरने के बाद एक दूर के रिश्तेदार ने मुझे शहर में ये प्लास्टिक का कचरा चुगने का काम दिला दिया। और बोला वो मुझसे मिलने आएगा पर कई महीनों बीत गए वो मुझसे मिलने नहीं आए,और बच्चे की आखों से आंसू निकल आते हैं, शिक्षक उसकी सारी बात बड़े ध्यान से सुनते हैं, फिर उसके सर पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हैं, और पूछते हैं,अच्छा ये बताओ तुम यहाँ रोज क्यू आते हो? और क्या देखते हो? तब वह लड़का कहता है,मै भी पहले स्कूल जाता था, अब माँ के गुजर जाने के बाद से नहीं जा पाया। इसलिए अपने पुराने दिन याद करता हूँ,यहां इस स्कूल को देख मै मेरे स्कूल के दिनों को याद करता हूँ,मुझे बहुत अच्छा लगता है
"अच्छा, तुम इन झण्डों से क्या कर रहे थे" शिक्षक उस लड़के से पूछते हैं
तब वह लड़का कहता है,मेरी माँ कहती थी कि ये मातृभूमि हमारी माँ हैं, ये झंडा हमारे देश की शान और सम्मान का प्रतीक है,इसलिए इसे कभी रास्ते में नहीं फैकना नहीं चाहिए।
इसलिए जब आज मैंने इन झंडो को रास्ते पर इन झंडो को पड़ा देखा तो मुझे मेरी माँ की बात याद आ गई। और मैंने ये झंडे उढाए, और इन मे से जो फट गए हैं उनको मिट्टी में गाड़ दिया बाकी जो सही है उनको मै अपने पास रख लुगा। अगली बार जब फिर कोई राष्ट्रीय त्योहार आएगा तब फिर से फहराहुंगा।
बच्चे की बात सुन शिक्षक बहुत प्रभावित हुए।
दूसरे दिन उन्होने उस लड़के को शाला में बुलाया और सभी विद्यार्थियों को उसके बारे में बताया। और एक सच्चे देश - भक्त के नाम से उसका सम्मान किया। इतना ही नहीं उसके शिक्षा की सारी जिम्मेदारी भी ली, उसी शाला में उसका दाखिला करवाया।
उमा वैष्णव
(मौलिक और स्वरचित)