‘नहीं’
-मनोहर चमोली ‘मनु’
तन्वी का तय किया हुआ था। वह जिस घर में ब्याही जाएगी, पहले उसे देखने जाएगी। पसंद आने पर ही हाँ कहेगी। तन्वी उठी और सीधे हरितिमा चली गई। गेट पर सुरक्षाकर्मियों ने रोक लिया। तन्वी की बात कराई गई। बीस मिनट बाद अन्दर जाने की अनुमति मिली। मिस्टर एंड मिसेज दोहरे ने पूरी हवेली घुमाई। दोनों अपने बड़ेपन के बड़े अहसास में आकण्ठ डूबे हुए थे। तन्वी चुपचाप सब कुछ देख-समझ रही थी।
मिस्टर दोहरे ने पूछा,‘‘तो कैसा लगा तुम्हें हमारा हरितिमा? यानि अपना होने वाला घर?’’ मिसेज दोहरे बोलीं,‘‘तन्वी हरितिमा को समझने के लिए तुम्हे दो माह लगेंगे।’’ तन्वी ने लौटते हुए बस इतना कहा,‘‘घर पहुँचकर फोन करूंगी।’’ यह कहकर वह लौट आई।
घर पहुँच कर वह सोच रही थी,‘‘ब्रह्माण्ड। उसमें कई गैलेक्सियाँ। उसमें हमारी नन्ही-सी गैलेक्सी। इस गैलेक्सी में छोटी सी पृथ्वी। पृथ्वी में कई महाद्वीप। उसमें हमारा महाद्वीप। उस महाद्वीप में कई मुल्क़। उन मुल्कों में एक हमारा भारत। भारत के कई राज्य। राज्यों में एक मुंबई। मुंबई में वाना। वाना में एक काॅलोनी। काॅलोनी में एक हरितिमा। हरितिमा पर इतना घमण्ड! इस घमण्ड की लघुता में तन्वी तेरी अहमियत? नहीं। कुछ नहीं। तेरा वजूद। कुछ भी नहीं।’’
उसने मोबाइल में नंबर डाॅयल किया। ट्रू काॅलर ने दिखाया-हरितिमा।
तन्वी ने दूसरे ही पल नंबर डिसकनेक्ट कर दिया। ॰॰॰
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