जो एक घर में बहुत सारे कमरे होते हैं पर एक कमरा ऐसा होता हैं जहाँ पर माँ रहती हैं उस कमरे में देवता निवास करते हैं , उम्र माँ की २८ हो या ८२ उस कमरे में एक बार जाकर माँ को देखकर जरुर आना चाहिए कुछ पल की बातचीत आपके चित्त को तो शांत करेगी ही माँ को भी सुकून देगी , आपके हाथो की लकीरे भी बदलनी शुरू हो जाएगी , पितृ दोष भी उनके सर लगता हैं जो माँ को पितृ नही मानते ., उम्र का एक पल ऐसा जरुर आता हैं जब इंसान को अपने किये पर अफ़सोस करने का भी वक़्त नही होता उस वक़्त ना चाहे भी उनके मन से एक ही कराह निकलती हैं उस वक़्त पितृ हो चुकी माँ के सत्कर्म ही आपके लिय एक कवच बन कर आते हैं , जितना प्यार अपनी संतान से किया जाता हैं उसका अंशत भी अगर माता पिता से किया जाए तो तो माता पिता तृप्त होकर अगले लोक को जाते हैं असंतुष्ट और मन से द्वेलित माता पिता पितृ होकर भी सहायता नही कर पाते जीते जी उनको संतुष्ट रखना जरुरी हैं मृत्यु उपरान्त किये जाने वाले श्राद तो मात्र उनको याद रखने के निमित्त मात्र होते हैं .....................#निविया