✍न बुतखाना, न ईबादत गाह, कि मेरा खुदा मुझ में है।
नज़र मेरी, राह मेरी,कि मेरा रहनुमा मुझ में है।
मुझ से कर जिरह वाईज़, मगर जिरह मजहबी न हो,
तू होगा मजहबी, मगर एक इंसाँ मुझ में है।
मेरे रकीब तू मुझे देख कर मुहं न फेर,
इसी सूरत ए दिल तेरा आईना मुझ मे है।
खुले से क्या खुले जिल्द मेरे जिस्म की,
मेरे ही गिर्द है जो और क्या मुझ में है।
✍हेमंत✍