*ये भी कार्य मंगल पुनीत*
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व्योम भी गुंंजायमान
धरा अरि की स्पंदित।
मृत्यु लिए आवरण अग्नि का
रिपु खंड खंड विखंडित।
क्रोधानल का जलधि वीरो मे
खर शोणित का स्त्राव सम निर्झर।
भस्म करने को आतुर योद्धा
वृष्टि बिंदु से चलते शर।
सहिष्णु रहे ज्यों
स्थिर हिमालय विनीत।
अब उठा दंड कर शत्रु शमन
ये भी कार्य मंगल पुनीत।
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