"ऐ अजनबी कौन है तू
कभी तो अपना तआरुफ करा,
"एक साया सा लिपटा रहता है मुझसे
इस बंधन की बेड़ियों को आजाद करा,
"तू घटा की तरह छा जाता है मुझपे
कभी तो मेरी रुह की प्यास बुझा,
"ऐसी कयामत ना ढ़ा तू मुझपे
दर्द-ए-दिल को कुछ तो सुकून पहुंचा,
"अब काटे नहीं कटता वक्त मुझसे
इन आंखों को दीदार-ए-यार करा,