वक़्त की पुकार सुन ले या मेरी आवाज सुन ले,
दूर वीराने में सिसकती तिरंगे की चित्कार सुन ले।
कब तक यूँ ही आँख मूंदे उम्मीदों संग जियेगा,
द्वार पर मौका खड़ा है उठ उसका अब सत्कार कर ले।
बहुत दिनों तक रही है छायी ये वीराने की खामोशी,
अब जरा आवाज दे दे कि खत्म कर ये बेबसी।
हार मांस से बने हम इंसान है कोई पुतला नहीं,
बहता है गर्म खून रगों में ये कोई लाल पानी नही।
जिस आजादी को पाया हमने शहीदों के बलिदान से,
अब तो जरा देशवालों उसकी कीमत पहचान ले।
हक हमारा मिल रहा है आज भी जैसे हो अनुदान,
और अब कितना सहे ये लोकतंत्र का नित अपमान।
झूठ की होती है पूजा सत्य बना गूँगा बहरा और बेचारा,
भ्रष्टाचार का है बोलबाला घोटाले पर होता घोटाला।
कब तक यूँ चलता रहेगा लुटनेवाला लुटता रहेगा,
और हम सब जान कर भी रहेंगें यूँही अनजान बनके।