त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं
पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
तमर्शवन्तं पुनराश्रयन्ति
अर्थो हि लोके मनुषस्य बन्धुः॥
मनुष्य के धनहीन हो जाने पर पत्नी, पुत्र, मित्र, निकट सम्बन्धी आदि सभी उसका त्याग कर देते हैं और उसके धनवान बन जाने पर वे सभी पुनः उसके आश्रय में आ जाते हैं। इस लोक में धन ही मनुष्य का बन्धु है, ये जानकर भी मनुष्य धन के लोभी संसार के लिये ही जीवन बिताकर व्यर्थ कर देता है, परमात्मा के लिये समय देकर जीवन का सदुपयोग नहीं करता है l
?? जय लंकेश ??