इनशानौ संग रहने की
अब मैं आदत डाल रहा हूँ
गुमनामी के भीड़ से जुदा हो
थोड़ी इनशानीयत सिख रहा हूँ
गुरूर गुस्सा और गृहणा से विपरीत
प्रेम के सादे शब्द केह रहा हूँ
जानवरों सा व्यवहार बदल मैं इन्सां
अब थोड़ी इनशानीयत सिख रहा हूँ
श्रम और शर्म की बात नहीं
रूबरू भी मैं उनसे हो रहा हूँ
भुल को भुला कर अपने मैं
पश्चाताप करना सिख रहा हूँ
अहम से जुदा हो मैं इन्सां
इन्सान होने की अहमियत सिख रहा हूँ