'गाँव वाला अंग्रेजी स्कूल' पुस्तक का एक अंश
स्कूल में दो शिक्षक थे और कक्षाएँ थीं पाँच। सुदूर क्षेत्र के विद्यालय अक्सर स्टाफ की कमी के मारे होते हैं। कई विद्यालय तो बंद पड़े रहते हैं क्योंकि वहाँ कोई शिक्षक जाना ही नहीं चाहता। उस लिहाज से तो सिगुइया का विद्यालय कई गुना अच्छा था कि वहाँ दो शिक्षक थे। शिवानी मैडम भी इसी वर्ष स्थानान्तरण लेकर विद्यालय में आयी थीं क्योंकि विद्यालय अंग्रेजी माध्यम का हुआ था। तीन और शिक्षकों की भी नियुक्ति हुई थी लेकिन वो सिगुइया की शहर से दूरी से इतने घबराये कि अपने पुराने विद्यालय में ही रहे। दो शिक्षकों को ही पाँचों कक्षाएँ सम्भालनी होती थीं। एक कक्षा में 3, 4, 5 के बच्चे बैठते थे और एक में 1, 2 के। शिवानी मैडम उस समय 1, 2 के बच्चों को पढ़ा रही थीं। हेडमास्टर जी ने रोहन को 3, 4, 5 के बाहर खड़ा किया और शिवानी मैडम को कक्षा से बाहर बुलाया। रोहन ने कक्षा के अंदर झाँका तो पाया कि अंदर से सभी बच्चे बड़े कौतूहल से रोहन को देख रहे हैं। महाराज पहाड़े बोल रहा था आठ एकम आठ, आठ दूनी सोलह........ अट्ठू–अट्ठू चौंसठ। रोहन को आठ, सोलह, चौंसठ तो फिर भी पल्ले पड़ रहे थे। लेकिन ये एकम, दूनी.... अट्ठू उसके लिए किसी और ही दुनिया के शब्द लग रहे थे। अंदर से महाराज भी एकटक होकर रोहन को देख रहा था। बाकि बच्चे पहाड़े बोल तो रहे थे लेकिन उनकी आँखें रोहन की ओर ही लगी हुई थीं। रोहन से थोड़ी दूर खड़े होकर हेडमास्टर जी ने शिवानी मैडम से कहा – “ये नया बच्चा शहर से आया है। शहर के सबसे बड़े अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता था। समय की आंधी इसे उड़ाकर यहाँ ले आयी है। तुम इसे कक्षा–3 में ले जाओ। मैं 1, 2 वालों को देखता हूँ।” शिवानी मैडम ने कहा – “बाउजी, पर मेरा पीरियड तो अभी कक्षा–1 का है फिर मुझे कक्षा–3 में क्यों भेज रहे हैं?” शिवानी मैडम, हेडमास्टर जी की बेटी की आयु की थीं। वो एकांत में हेडमास्टर जी को बाउजी ही कहती थीं और सबके सामने सर। हेडमास्टर जी ने कहा – “शहर के विद्यालयों में प्राइमरी में अधिकांश लेडी टीचर ही होती हैं। ये बच्चा वैसे ही मुझसे कुछ डर रहा है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि इसकी शुरुआत तुमसे हो तो थोड़ा सहज हो। बच्चे के लिए टाईमटेबल से भी ज्यादा जरूरी होता है कम्फर्टेबल।”
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