फिर से रण का उदघोष हुआ,हो रही चुनाव की तैयारी है,
शब्दों के तीखे बाण है चल रहे, झूठे वादों की बारिश है।
सारे काले कौओं ने अब सफेद लिबास सिलवा ली है,
खुद को सच्चा साबित करने की हो रही खास तैयारी है।
दुर्भाग्य देश का और क्या हो बिना नीति नियत सब नेता है।
सत्ता की ऐसी हवस की और कुछ समझ मे नहीं आता है।
मंदिर -मस्जिद, आरक्षण और कर्ज माफी का आश्वासन।
जाति ,धर्म के छाव तले सरकार बनाने का कैसा समीकरण।
कब हम नींद से जागेंगे, कब हम खुद को पहचानेंगे।
झुठे उम्मीद की डोर लिए कब तक सच को झुठलाएँगे।
ये लोकतंत्र है जनता का तंत्र है ना राजा कोई ना
शहज़ादा।
ये राष्ट्र हमारी अपनी है और हम इसके है भाग्य विधाता।