एक बूढ़ी मां को सड़क के किनारे
अक्सर बैठा पाता हूं,
मैं भी तो उस मार्ग से
अक्सर आता जाता हूं ।
गुज़रती भीड़ से कुछ गिनती के लोग,
तरस खाकर या सेवा भाव से
पैसे या कोई वस्तु दे जाते हैं ।
परंतु उस मां का हाथ,
सदैव आशीष स्वरूप उठा ही रहता है, वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति के लिए,
चाहे उसे उनसे कुछ मिले या न मिले।
और मैं ये सोचता हूं कि,
वो यहां लोगों से कुछ लेने के लिए
बैठी है या सबको आशीष देने के लिए?
~ सूरज प्रकाश