जो यह शब्दों की कश्ती है
ना तेरी है ना मेरी है
सदियों से सिद्दत से चलती
बहती सबके जीवन में थेरी है
यह जो शब्दों की कश्ती है
गहरे विचारों के लेहरों पर
जीवन के संघर्ष से जूझती है
धाराओं मैं अपनी यह बांधे
प्यार के झोंको संग बहती है
यह जो शब्दों की कश्ती है
समा सफ़र बंता है इसका
यह ठहर ठहर ही चलती है
सवार होकर इसपे जिन्दगी
रोती तो कभी, कभी हस्ती हैं
यह जो यह शब्दों की कश्ती है
रिश्तों के किनारों से
परहेज है इससे
संभल कर वहां से,
यह सेहमी सी गुजरती है
जज्बातों के सैलाब मैं, यह घिरी रहती
जो यह शब्दों की कश्ती है
अरमानों के आरज़ु को
लबों पर रखे हुए
छुट जाए जो पकड़ कभी
यह गुस्ताख सी बहकती है
जो यह शब्दों की कश्ती है
खुशी को बदल कर यह,
आँखों मैं अश्कों से
वक़्त मैं हालत कुछ ऐसे बदल देती है
उभर पाती नहीं फिर जिन्दगी
जब दुबाती यह शब्दों की कश्ती है
अनमोल सासों की डोर सी है
टूट जाए तो भीखर देती है
पर यही वोह हौंसला भी है
जो संभालती है, जो बटोरती है
यह जो शब्दों की कश्ती है
यही बनाती राम को
रावण भी यही बनाती है
गुमनाम अंधेरों से खीच कर
मान में विश्वास भर देती है
जो यह शब्दों की कश्ती है
सिर्फ जुबान से नहीं
यह आँखों से भी बहती है
हर पल हर छण, हर वस्तु विशेष पे
अपना मुकाम छोड़ती है
यह जो शब्दों की कश्ती है
इस संसार की गाथा है यह
हर दिल मै यह ठहरी है
पहचान है यह तेरी मेरी
पर ना तेरी ना मेरी है
जो यह शब्दों की कश्ती है