जैसे डाल डाल पर देखो
खिला हुआ है पान
वैसे ही इस धरती पर
फैला हुआ इन्सान
भीन भीन है रुप इसके
भीन भीन है जबान
फिर भी जाने क्यु सारे
लगते एक समान
जिता अपनी मर्जी से ये
फिरता सीना तान
एक दूजे से जितने में ही
है अब इसकी शान
देखो लगा मिटाने में है
अब खुद की पहचान
अटक गई है जात पात पर
अब इसकी यह जान
गुरूर में झुठे डुबे कैसे
भटक रहे यह देखो
भीड़ में इन्सानों की ढुंढे
अब अपनी जाति इन्सान
कहे यह खुद को, कहे औरों से
नहीं कोई एक समान
लगा हुआ है मानवाने मैं
बस मेरी जात महान
न जाने कहाँ से है आती
आके कितना है ये रुलाती
जाति के नाम से जानी जाती
जाने कब बन गई सबका अभिमान
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
हर दिशा में इसका प्रमाण
अपने आप को भूल कर देखो
खुद की जात ढूंढ रहा इन्सान