मै लिखता गया,
वो पढ़ते गए,
प्यार का अफसाना,
कई बरस बीत गए,
यूं सिलसिला चलता रहा,
फिर अचानक एक दिन वो बोले,
माफ करना दोस्त,
दरअसल मुझे कुछ समझ नहीं आया,
तुम बहुत अच्छा लिखते हो,
पर ये मेरे टाइप की नहीं है,
मै प्रार्थना करती हूं,
तुम्हे तुम्हारे अफसानों को पढ़ने वाली मिले,
चलती हूं,वो दूर खड़ा मेरा किताब,
मेरी प्रतीक्षा कर रहा।
©Krishna Katyayan 2018