"रुहानी" _
'तुम कौन हो'?
'मै रुहानी हूं :
उस परमात्मा की रची कहानी हूं :
ईश्वर ने जब से है, ये सृष्टी बनाई,
तब से हूँ मै इस जग मे आई *
"तुम कौन हो"?
' मैं रुहानी हूँ।
कभी खत्म होती, कभी फिर से बनती,
विभिन्न रूप - रंगों मे रची कहानी हूँ,
'मैं रुहानी हूँ'।
कभी नदी सी सांत, कभी सरोवर कि लहरों की
तरह कौतुहल करता मन है मेरा,
विभिन्न रंगों वाला शरीर चोला है मेरा:
उगते सूरज की चमक मुस्कान है मेरी :
तपती' धूप' पेहचान है मेरी,
ढलता सूरज शाम है मेरी,
कहीं चांद की चांदनी रोशनी बनी,
कहीं तारों से झिलमिलाती अंधेरे मे डूब जाती
रोशनी है मेरी'
इतिहास, साहित्य के पन्नों कि सुगंध सुहानी हूँ,
"मैं रुहानी हूँ"।
किसी का बचपन, किसी का बुढापा,
किसी की जवानी हूँ,
"इस जन्म - मृत्यु के खेल में मोक्ष पाने की दीवानी हूँ :
" मैं रुहानी हूँ "।