*-हरिवंशराय बच्चन की*
_*एक सुंदर कविता ...*_
*खवाहिश नही मुझे मशहुर होने की।*
*आप मुझे पहचानते हो बस इतना ही काफी है।*
*अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे।*
*क्यों की जीसकी जीतनी जरुरत थी उसने उतना ही पहचाना मुझे।*
*ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी कितना अजीब है*
*शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं....!!*
*एक अजीब सी दौड़ है ये ज़िन्दगी,*
*जीत जाओ तो कई अपने पीछे छूट जाते हैं,*
*और हार जाओ तो अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं।*
*बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर...*
*क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है..*
*मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा,*
*चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना ।।*
*ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है पर सच कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है*
*जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक मुद्दत से मैंने*
*न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले .!!.*
*एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बाँध ली..*
*वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे..!!*
*सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से..*
*पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला !!!*.