कविता:-
प्रेम दीवानी
सावन सूना, सूनी रतियां
सूना सब संसार।
पिया बिना कछु न भावे
का हार, का श्रृंगार।
पपीहा बोले ,मन जले बाबरा
दिल पे चले कटार।
शम्मा का परवाना दूर है
अब कौन करेगा प्यार।
दीपक राग अगन लगाए
सुलगे मन के तार।
कब के बिछड़े, कहां मिलेंगे?
बरसा दो ना मल्हार।
भंवरा गुंजन कली पे करता
रहता है बेकरार।
भंवरे ने रस पिया कली का
नींद रही न करार।
नींद रही न करार
फिर भी मैं अनजानी
कुछ न जानी।
ढाई अक्षर प्रेम का पी
भई "सीमा "दीवानी
सीमा शिवहरे" सुमन"